डोंगरगांव, छत्तीसगढ़ :

कहते है संघर्ष जितना ज्यादा होगा जीत उतनी ही शानदार होगी बस ऐसा ही कुछ कर गुजरने की चाह में एक छोटे से गांव की दिव्यांग बच्ची जिसने अपने हौसले को अपने जहन में जिंदा रखा और आत्मविश्वास को कभी कमजोर नहीं होने दिया। उस दिव्यांग बच्ची ने तमाम कठिनायों और परेशानियों को अपने हौसले के आगे टिकने नहीं दिया और बढ़ चली अपने लक्ष्य की ओर। एक ऐसी ही दिव्यांग बच्ची की कहानी है जिसने सिर्फ अपने दम पर अपनी अपंगता को हुनर में बदल दिया और खड़ी हो गई समाज के अन्य हुनरमंदों से कंधे से कंधा मिला कर। आज वह बच्ची अन्य दिव्यांगों के लिए प्रेरणा और सफलता की कुंजी साबित हो रही है।

डोंगरगांव तहसील मुख्यालय के अंतर्गत आने वाले ग्राम तिलईरवार की रहने वाली लक्ष्मी साहू जो पूरी तरह अपंग है। लेकिन लक्ष्मी अपनी अपंगता से निराश नहीं हुई बल्कि अपनी इस ज़िन्दगी से बेहद खुश है और ज़िंदादिली से बिता रही है। लक्ष्मी का कहना है कि शुरू में कुछ परेशानियां हुई पर मैने अपना आत्मविश्वास कम नहीं होने दिया और मेहनत और लगन से आज मैं वो सब कर सकती हूं जो अन्य लोग करते हैं। वाकई लक्ष्मी का यह जस्बा काबिले तारीफ है। किन्तु इन सब के बीच एक सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस पहाड़ जैसी ज़िन्दगी को जीने के लिए आर्थिक मजबूती आवश्यक जो लक्ष्मी के पास नहीं है।

विभागीय कार्य को भी बड़ी आसानी से कर सकती लक्ष्मी : दिव्यांग लक्ष्मी और उनके पारिवारिक सदस्य तथा ग्राम सरपंच चंद्रकुमार साहू ने बताया कि तीन भाईयों की एक बहन लक्ष्मी बचपन से ही दिव्यांग है, जिसमें उसके दोनो हाथ है ही नहीं. वह अपना सारा कार्य अर्धविकसित दाहीने पैर से ही करती है. जिसमें वह मोबाईल चलाने से लेकर रजिस्टर में लिखने जैसे बारिक काम भी आसानी से कर लेती है. रजिस्टर में उसके पैरों द्वारा लिखे गए मोती जैसे शब्द उसके द्वारा किये गए मेहनत का बखान करने के लिए काफी है. दिव्यांगों के लिए एक प्रेरणा बनकर उभर रही लक्ष्मी अपने आंगनबाड़ी केन्द्र में पहुंच रहे गांव के सत्रह बच्चों को एक कुहार की तरह गढ़ रही है. जिसमें उसे आंगनबाड़ी केन्द्र में काम कर रही सहायिका जमुना पटेल एवं गांव वालों के साथ ही ग्राम पंचायत तिलईरवार सरपंच चंद्रकुमार साहू का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है। इन सब के बीच विभागीय कार्य की अधिकता और के रूप में काफी कम राशि उसे निराश करती है.

रहती है अपने नाना नानी के पास : तिलईरवार गांव में अपने बुढ़े हो चले नाना सुदर्शन साहू व नानी थानीबाई साहू के साथ जीवन यापन कर रही है। दिव्यांगता के चलते वर्तमान में उसके नाना-नानी ही सहारा हैं, कितु कब तक ? बहुत से काम मे लक्ष्मी की नानी भरपूर सहयोग करती है। नानी के हाँथ अब कांपने लगे है, कान की क्षमता और नज़र दिन- ब- दिन कम होती जा रही है ऐसे में भी लक्ष्मी को तैयार करके आंगनबाड़ी भेजती है। उसके नाना ने बताया कि बहुत ही कठिन हालात में बच्ची को संभाले हैं और जब तक हैम है संभालेंगे भी बस इस बात की चिंता है कि हमारे बाद उसका ख्याल कौन रखेगा। जन्म से विकलांग लक्ष्मी महज एक वर्ष की आयु से ही अपने नाना-नानी के पास पली-बढ़ी और उन्ही के साथ रहती है।

पढ़ाई में सामान्य बच्चों से कम नहीं थी : पूर्ण रूप से दिव्यांग लक्ष्मी शुरू से ही प्रथम श्रेणी की विद्यार्थी रही है। बहुत कठिनाइयों और मेहनत के बाद उसने यह मुकाम हांसिल की है। पहली से लेकर स्नातक की कक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करते हुए सफलता प्राप्त की है। स्कूल और कॉलेज में सामान्य बच्चों के साथ अपनी डियाबिलिटी को किनारे करते हुए बाकायदा स्कूल गई और अच्छे नंबरों से परीक्षा उतीर्ण की।

बनना चाहती है टीचर : वर्तमान में लक्ष्मी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के पद पर कार्य करते हुए बच्चों को शिक्षा-दीक्षा दे रही है, लेकिन वह शासन-प्रशासन की मदद से शिक्षाकर्मी के रूप में कार्य करना चाहती है. जिसमें वह अपनी शिक्षा और हुनर का सही उपयोग कर सके. लक्ष्मी कक्षा बारहवीं में प्रथम श्रेणी से सफल होने के बाद आर्ट विषय में स्नातक की पढ़ाई की और उत्तीर्ण हुई. लेकिन इन सब के बाद भी नियम व शर्तों के तहत शिक्षक बनने का सपना पूरा न हो सका। लक्ष्मी की टीचर बनने की ललक और मेहनत को ध्यान में रख कर उसके नाना ने अपने स्तर पर शासन और प्रशासन तक अपनी बात तो पहुंचाई लेकिन कुछ न हो सका। लक्ष्मी के मन मे इस बात का दुख तो है पर वह अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा से बच्चों के साथ हँसी खुसी से निभा रही है।

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